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“आप”

“आप”
आप के दिमाग की धूल साफ करने आया था आप ,
सादगी की परछाई बन कर आया था आप ,
एक मफ़लर लपेट कर मुख्यमंत्री बना आम जनता का संत्रि बना ,
दर्द को समझा आम के आम का सहारा बना ,
मैं चला अपनी पुरानी गाड़ी में झाड़ू लेकर ,
भूल गया पद अपना छोटे से राज काल में इस ,
दो महीने के साल में ,
सोचा उन्नति दे दूँ पर .....जाने क्या हुआ क्यूँ काला साया पड़ा ,
के जन का सेवक आज उठ न सका, कल गूंगे हो जाओगे आवाज़ कहाँ होगी ,
आज मैं निकला कल तुम निकले यह है भ्रष्टाचार की व्यथा ,
भारत है गरीब और गरीब है बन रहा यही है बस यही है आप की व्यथा ,
आपकी धूल उड़ाते उड़ाते खुद धूल हो गया ,आम के लिए लड़ा बड़ी भूल हो गया ,
जो दिख रहा वो मिथ्या है जो न दिखे वो सत्य है ,
आप बसे हर “आप” के दिल में जीवन में ये लगता कढ़वा सत्य है ,
इतिहास गवाह है आम मरता है कतारों में ,
मैं उठा आप बनकर गिर भी गया यह आप का सत्य है ..................जागो भारत
अभी सो गए तो मौसम बदल जाएगा............
फिर कौन मेहनत की खाएगा ...........  




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अकेला हो जाता हूँ

जाने क्यों आज खालीपन की भीड़ में खो जाता हूँ, अकेले रहने की होड़ नहीं है मजबूरी है जीने की, सोता कम हूँ जागता ज्यादा, कहीं खो जाता हूँ, अक्स के साथ को क्या साथ कहूँ मैं मेरे यारों, दिखता नहीं है पास मेरे जब मैं रो जाता हूँ, साथ बिताए लम्हों की कसक काट रही है, जब लौटता हूँ शाम को घर अकेला सा हो जाता हूँ, किस्मत का परिंदा उड़ान भर न पाया, हर लमहे को काटूँ कैसे सोचता हूँ, यादों की दीवारों से तसवीरों को नोचता हूँ, मुस्कुराने की वजह तो मिले इस वीराने में, कहीं किसी दोस्त की दस्तक को खोजता हूँ , फिर चिढ़ कर अपनी मायूसी की भीड़ में खो जाता हूँ, अकेला हो जाता हूँ , मैं खो जाता हूँ  बलबीर