दिव्य मनोरथ उनके पूरे, सपने भूले आधे अधूरे, जीवन मस्तक पर रेखा, बीता कल किसने देखा, बचपन दिया , जवानी दी, बुढ़ापे की है महीन रेखा, इसे खींचने साठ बिताए, जीवन से सब कुछ सीखा, खुशियों का ये बड़प्पन, अब लौटा है जो जीना है, अब जीना है हर पल देखना है जो अनदेखा है, अलसाई आँखों के सामने, उजले कल का अभिलेखा है, "प्रबल"