सुसंगठित एवं शास्त्रीय रूप से आयुर्वेदीय शल्यचिकित्सा की नींव इंद्र के शिष्य धन्वंतरि ने डाली। धन्वंतरि के शिष्य सुश्रुत ने इस शास्त्र को सर्वांगोपांग विकसित कर व्यवहारोपयोगी स्वरूप दिया। उस समय भी शल्य का क्षेत्र सामान्य कायिक शल्यचिकित्सा था और ऊर्ध्वजत्रुगत रोगों एवं शल्यकर्म (अर्थात् नेत्ररोग, नासा, कंठ, कर्ण आदि के रोग एव तत्संबंधी शल्यकर्म) का विचार अष्टांग आयुर्वेद के शालक्य नामक शाखा में पृथक् रूप से किया जाता था। भारत में की अस्पताल हैं लेकिन क्या सही मायनों में वो अस्पताल का कर्तव्य निभा रहे हैं ? आज जब भारत में कई लाभोन्मुखी और आत्मसुख प्रेमी अस्पताल मौजूद हैं । शल्यचिकित्सा(सर्जरी) लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गई है । इस प्रकार के उन्नत,अनुभवी, प्रतिभाशाली, सजग और सुदृढ़ शल्यचिकित्सकों की भारत में कमी है। अरविंद साहब की टीम एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का प्रोटोकॉल फ़ॉलो कर रहे हैं जो भारत में एक अनूठा प्रयास है ।चिकित्सा का क्षेत्र ऐसा होता है कि कोई भी क्षेत्र या अस्पताल इसमें बेदाग़ नहीं रहता है। लेकिन मेदांता गुड़गाँव अपने पथ पर प्रशस्त भारत को नयी ऊँचाइयाँ दे र...
दिव्य मनोरथ उनके पूरे, सपने भूले आधे अधूरे, जीवन मस्तक पर रेखा, बीता कल किसने देखा, बचपन दिया , जवानी दी, बुढ़ापे की है महीन रेखा, इसे खींचने साठ बिताए, जीवन से सब कुछ सीखा, खुशियों का ये बड़प्पन, अब लौटा है जो जीना है, अब जीना है हर पल देखना है जो अनदेखा है, अलसाई आँखों के सामने, उजले कल का अभिलेखा है, "प्रबल"