जाने क्यों आज खालीपन की भीड़ में खो जाता हूँ,
अकेले रहने की होड़ नहीं है मजबूरी है जीने की,
सोता कम हूँ जागता ज्यादा, कहीं खो जाता हूँ,
अक्स के साथ को क्या साथ कहूँ मैं मेरे यारों,
दिखता नहीं है पास मेरे जब मैं रो जाता हूँ,
साथ बिताए लम्हों की कसक काट रही है,
जब लौटता हूँ शाम को घर अकेला सा हो जाता हूँ,
किस्मत का परिंदा उड़ान भर न पाया,
हर लमहे को काटूँ कैसे सोचता हूँ,
यादों की दीवारों से तसवीरों को नोचता हूँ,
मुस्कुराने की वजह तो मिले इस वीराने में,
कहीं किसी दोस्त की दस्तक को खोजता हूँ ,
फिर चिढ़ कर अपनी मायूसी की भीड़ में खो जाता हूँ,
अकेला हो जाता हूँ , मैं खो जाता हूँ
बलबीर
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